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अमित धर्मसिंह को डॉक्ट्रेट की मानद उपाधि
November 4, 2019 • TRUE स्टोरी टीम

मुज़फ्फरनगर के वहलना निवासी अमित धर्मसिंह को प्रभाष जोशी पर शोध करने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्ट्रेट की   मानद उपाधि प्रदान की गई है। यह उपाधि उन्हें दिल्ली के मल्टीपरपज हॉल में आयोजित दिल्ली विश्वविद्यालय के छियानवे एनुवल कन्वोकेशन में माननीय प्रो. धीरेन्द्र पाल सिंह, अध्यक्ष यूजीसी और माननीय प्रो. योगेश कुमार त्यागी जी  के कर कमलों द्वारा प्रदान की गई। अमित धर्मसिंह ने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से "प्रभाष जोशी के लेखन में राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक चेतना" विषय में पीएच.डी. पूर्ण की है। इससे पूर्व प्रभाष जोशी पर वृहद शोध कार्य नहीं हुआ था। यह पहला शोध है जो प्रभाष जोशी के समग्र लेखन को आधार बनाकर उनकी राष्ट्रीय एवं सस्कृतिक चेतना को विस्तृत रूप में सामने लाता है। वहलना गांव के साथ - साथ जिले में अमित धर्मसिंह पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी में पीएच.डी. की है। यह वहलना और जनपद मुजफ्फरनगर के लिए गौरव का विषय है।
                                   

मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के आष्टा नामक गांव में पंद्रह जुलाई उन्नीस सौ सैंतीस को जन्मे प्रभाष जोशी आजादी के बाद की पत्रकारिता के युग पुरुष रहे हैं। उन्होंने उन्नीस सौ उनसठ में इंदौर से निकलने वाले लोकप्रिय अखबार 'नयी दुनिया' से पत्रकारिता की शुरआत की थी। उस दौरान उन्होंने विनोबा भावे के भू दान यज्ञ की उनतालीस दिनों की विशेष रिपोर्ट तैयार की थी। उसके बाद प्रभाष जोशी पत्रकारिता में स्थापित होते चले गए। राहुल बारपुते को प्रभाष जोशी अपना गुरु मानते थे। अपने साहित्यिक रुझान को उन्होंने पत्रकारिता के रास्ते में इसलिए नहीं आने दिया कि वे सीधे जनता से संवाद करना चाहते थे। जनता की आवाज को अपनी लेखनी का विषय बनाना चाहते थे। पत्रकारिता के इस सफर को तय करते हुए वे इमरजेंसी से पहले, दिल्ली आ बसे थे। इस दौरान वे जयप्रकाश नारायण के मुख्य सहयोगियों में रहे। उन्होंने संपूर्ण क्रांति और चंबल के डाकुओं के समर्पण में महती भूमिका अदा की। इस दौरान अपने साथियों के साथ मिलकर उन्होंने " चंबल की बंदूकें गांधी के चरणों में" नामक पुस्तक भी लिखी। जे. पी. के कहने पर ही प्रभाष जोशी इंडियन एक्सप्रेस समूह और रामनाथ गोयनका से जुड़े थे। उन्नीस सौ तिरासी में रामनाथ गोयनका के कहने पर प्रभाष जोशी ने उन्नीस सौ बावन में एक साल चलकर बंद हो चुके हिंदी दैनिक जनसत्ता का पुनः संपादन शुरू किया था जो देखते ही देखते प्रबुद्ध जनों का प्रिय अखबार बन गया था। इसका कारण अखबार की भाषा और पत्रकारिता के मूल्य थे। उन्नीस सौ बावन में भाषा की क्लिष्टता के चलते  रामनाथ गोयनका को जनसत्ता बंद करना पड़ा था। लेकिन प्रभाष जोशी के कारण हिंदी की सहज सरल भाषा जनसत्ता का प्राण बनकर उभरी थी। उन्नीस सौ बानवे में प्रभाष जोशी ने कागद कारे नामक साप्ताहिक कॉलम लिखना शुरू किया। जिसने जनसत्ता को अप्रत्याशित ऊंचाई प्रदान की। प्रभाष जोशी पत्रकारिता को जनमत बनाने का सबसे ठोस और कारगर माध्यम मानते थे इसलिए पत्रकारिता में भरपूर जिम्मेदारी और ईमानदारी बरते जाने के पक्षधर थे। वे पेड़ न्यूज़ को खतरनाक मानते थे इसलिए इसके खिलाफ उन्होंने सक्रिय आंदोलन भी चलाया था। प्रभाष जोशी प्रेस की आज़ादी के भी हामी थे और उसके निरंकुश होने से भी भयभीत थे। वे चाहते थे कि पत्रकारिता अपने उत्तरदायित्वों में आजाद और मनमानेपन में प्रेस काउंसिल द्वारा नियंत्रित रहे। दोनों ही बातों के लिए प्रभाष जोशी ने रचनात्मक प्रयास किए थे। प्रभाष जोशी पत्रकारिता को जनभावनाओं से जुड़ा पवित्र कर्म मानते थे इसलिए पत्रकारिता में प्रयोग किए जाने वाले अनुचित तरीकों और साधनों के खिलाफ थे। उनके साथ और बाद के बहुत से पत्रकार उनको आज भी अपना आदर्श मानते हैं। कई विद्वानों ने तो पत्रकारिता के निरंतर होते पतन को देखकर उन्हें आखिरी संपादक तक घोषित किया ।

प्रभाष जोशी की राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना

प्रभाष जोशी राष्ट्र को सनातनता और समग्रता में लेने के हामी रहे हैं। भारत विविधताओं वाला देश है। इसमें विविध भाषा बोलने और विभिन्न धर्म तथा मजहब के मानने वाले रहते हैं। इन सबके सांस्कृतिक योगदान से ही इस देश की संस्कृति का निर्माण हुआ है। रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक 'संस्कृति के चार अध्याय' में भारतीय संस्कृति के विकास क्रम को चार चरणों में बांटकर समझा और इस नतीजे पर पहुंचे कि भारत की संस्कृति सामासिक संस्कृति है। प्रभाष जोशी इसी सामासिक संस्कृति के पक्षधर हैं। उनका मानना है कि देश में प्रत्येक क्षेत्र और प्रांत की संस्कृतियों का न सिर्फ सम्मान होना चाहिए बल्कि उनका उचित संरक्षण भी किया जाना चाहिए। ऐसा करने को प्रभाष जोशी हिन्दू धर्म की सनातन संस्कृति का परिपालन मानते हैं। वे मानते हैं कि भारत की सनातन संस्कृति के मूल संदेश अयम् निज: परोवेती गणना लघुचेत्साम, उदार चारितानाम् तू वसुधैव कुटुंबकम्  और सर्वे भवन्तु सुखिन:  सर्वे संतु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यंतू मा कश्चिद दुखभाग भवेत्" हैं, जिन्हें समझने की पुरजोर आवश्यकता है। प्रभाष जोशी मानते हैं कि आज भारत में जो सांस्कृतिक टकराव है, उसके लिए तो हिन्दू धर्म का प्रचार प्रसार करने वाले आदि शंकराचार्य से लेकर दयानंद और विवेकानन्द तक नहीं रहे हैं। इसलिए भारत की सामासिक संस्कृति को समझने और अपनाने की जरूरत है।
इसी संदर्भ में प्रभाष जोशी मानते हैं कि भारत को अपनी तरह का राष्ट्र अपनी तरह से ही बनना चाहिए। जिसके सूत्र इसी के इतिहास में हैं। भारत कभी भी इस्लामिक प्रतिक्रियावादी नहीं रहा है और न ही यह अंग्रेजियत का अनुकरण करने वाला रहा है। इसलिए इसे उक्त आधार पर एक खुशहाल राष्ट्र नहीं बनाया जा सकता है। इसे अपनी समग्रता और उदारता को नहीं खोना चाहिए और न ही राष्ट्र संबधी जो यूरोपीय चिंतन है उसके अनुसार भारत को तथाकथित राष्ट्र बनाने की तरफ अग्रसर होना चाहिए। क्योंकि यूरोपीय चिंतन में एक भूमि, एक भाषा और एक संस्कृति को राष्ट्र की संज्ञा दी गई है जबकि भारत कभी भी इन कसौटियों पर खरा नहीं उतारा जा सकता है। भारत को, इसकी भौगोलिकता, विविध भाषाओं , विविध धर्मों को स्वीकारते हुए अपनी तरह का राष्ट्र मानना चाहिए। इसी आधार पर इसे प्रगति पथ पर आगे ले जाना चाहिए। प्रभाष जोशी भारत को न रूढ़िवादी राष्ट्र, न जनवादी राष्ट्र, न हिंदू राष्ट्र, न मुस्लिम राष्ट्र, न सिक्ख राष्ट्र और न ईसाई राष्ट्र स्वीकार करते थे। वे इसे उदारवादी राष्ट्र स्वीकार करते थे। यह काफी हद तक वही राष्ट्र है जिसकी कल्पना महात्मा गांधी, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण ने की थी। भारत में कई अलग-अलग राष्ट्र होने का राजनीतिक चिंतन अंग्रेजो का था, जिससे कि वे भारत को टुकड़ों में बांटकर राज कर सके। प्रभाष जोशी मानते हैं कि हमें उनके इस राष्ट्रवादी चिंतन से सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर से  बचने की आवश्यकता है।

                         

शोध में रहे हैं कई सहयोगी

प्रभाष जोशी पर शोध करने हेतु स्व. डॉ कृष्ण चन्द्र गुप्त ने प्रभाष जोशी का नाम सुझाया था। डॉ पूरन चंद टंडन ने शुरुआती रूपरेखा बनाने में मदद की। तत्पश्चात शोध निर्देशक प्रो. कैलाश नारायण तिवारी जी के कुशल नेतृत्व में शोध कार्य निपटाने में भरपूर निर्देशन, वैचारिक तथा अकादमिक सहयोग प्राप्त हुआ। दोनों शोध सलाहकारों प्रो. गोपेश्वर सिंह तथा प्रो. हरिमोहन शर्मा ने यथासंभव अकादमिक सहयोग दिया। मास्टर विजय सिंह के साथ ने मानसिक संबल दिया। परमेंद्र सिंह ने शोध की टाइपिंग और साज - सज्जा में रचनात्मक भूमिका अदा की। पत्नी गीता ने प्रूफ रीडिंग और माता पिता ने आशीर्वाद और बाकी पारिवारिक जनों ने हर संभव सहयोग देकर शोध को समय से निपटाने में अमूल्य योगदान प्रदान किया। इनके अतिरिक्त प्रभाष जोशी के बेटे संदीप जोशी और कई अन्य मित्रों का रचनात्मक सहयोग भी उल्लेखनीय रहा। इस संबंध में अमित धर्मसिंह ने सभी का हृदय से आभार ज्ञापित किया है। 
                                 

शोध के अतिरिक्त अमित धर्मसिंह लिख चुके हैं कई पुस्तकें

 जनपद मुजफ्फरनगर के कस्बा ककरौली में 18 जून 1986 को जन्मे अमित धर्मसिंह अब तक कई पुस्तकें लिख चुके हैं। ये जब पांच या छह बरस के होंगे तभी इनका परिवार इनके ननिहाल वहलना में आ बसा था। इसी कारण इनकी आरंभिक शिक्षा ककरौली में शुरू तो हुई लेकिन पूरी गांव वहलना में हुई। हिंदी में स्नातकोत्तर की शिक्षा मुजफ्फरनगर के सनातन धर्म महाविद्यालय से संपन्न हुई। यही रहते हुए इन्होंने नेट/जेआरएफ की परीक्षा उत्तीर्ण की और सन दो हजार तेरह में रिसर्च फेलो के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। अपने साहित्यिक रुझान के चलते ये संबंधित विषय में शोध तो करते ही रहे साथ ही साहित्य सृजन भी करते रहे। इनकी कविता की पहली किताब "आस विश्वास" उस वक्त प्रकाशित हुई जब ये बीए प्रथम वर्ष के विद्यार्थी थे। दो हजार सत्रह में इनकी विविध लेखों से जुड़ी पुस्तक "रचनाधर्मिता के विविध आयाम" दिल्ली के नमन प्रकाशन से प्रकाशित हुई। दो हजार अट्ठरह में इनकी शोध आलेखों की पुस्तक "साहित्य का वैचारिक शोधन" दिल्ली के शिल्पायन प्रकाशन से प्रकाशित हुई। इसी सन और इसी प्रकाशन से इनके द्वारा संपादित पुस्तक "विरले दोस्त कबीर के: एक मूल्यांकन" भी प्रकाशित हुई। हाल ही में जयपुर के बोधि प्रकाशन से इनका कविता संग्रह "हमारे गांव में हमारा क्या है!" प्रकाशित हुआ है जो खासा चर्चा में है।
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निरंतर सकारात्मक और सक्रियता से हासिल किया जा सकता है कोई भी मुकाम

अमित धर्मसिंह के पिता धर्मसिंह राजमिस्त्री रहे हैं और माता कुसुम देवी गृहिणी। पिता थोड़े बहुत साक्षर किन्तु माता पूर्णतः निरक्षर हैं। छह बहन-भाइयों में सबसे बड़े अमित धर्मसिंह बचपन से ही अपनी पढ़ाई के प्रति गंभीर थे। इनका परिवार प्राथमिक शिक्षा के लिए तो आर्थिक खर्च वहन कर सकता था किन्तु उच्च शिक्षा के लिए नहीं। लिहाजा इन्होंने कक्षा आठ से ही विभिन्न जगहों पर,  कभी दिन की तो कभी रात की ड्यूटी करना शुरू कर दिया था। इन्होंने आठ सौ रुपए प्रतिमाह रोलिंग मिल में काम किया। बारह सौ रुपए प्रति माह हॉस्पिटल में रात की ड्यूटी की। छह सौ रुपए माह में आठवीं तक के स्कूल में पढ़ाया। इसके अतिरिक्त भी इन्होंने जरूरत के अनुसार बहुत से कार्य किए। इस तरह अथक परिश्रम और संघर्ष से इन्होंने पढ़ाई की जटिल राह को आसान बनाया। अमित धर्मसिंह मानते हैं कि यदि आदमी में अपने कार्य और लक्ष्य के प्रति जज्बा और ईमानदारी है तो कुछ भी संभव है। वे बताते हैं कि वे हमेशा सकारात्मक और सक्रिय रहना पसंद करते हैं। अपने हर अच्छे-बुरे हालात से उचित सीख लेकर जीवन - यात्रा को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं। अमित धर्मसिंह बताते हैं कि उनके जीवन में यही वो मूल मंत्र है जिससे कि जीवन के हर भाग को ऊर्जा में बदलकर वांछित कार्य में प्रयोग किया जा सकता है।
                               

अमित धर्मसिंह ने शोध प्रभाष जोशी को श्रद्धांजलि स्वरूप किया समर्पित 

आज से ठीक एक दशक पहले 5 नवंबर 2009 को  प्रभाष जोशी इस संसार को विदा कह गए थे। प्रभाष जोशी बचपन से ही क्रिकेट के बहुत शौकीन थे। वे बनना भी क्रिकेटर ही चाहते थे किन्तु घर के माली हालात के चलते उनका सपना, सपना ही बनकर रह गया। किन्तु उन्होंने अपने इस सपने को पूरा कभी नहीं मरने दिया। उन्होंने क्रिकेट खेला तो नहीं लेकिन क्रिकेट पर जमकर लिखा। कागद कारे का पहला कॉलम 'क्रिकेट का कोकाकोकाकरण' शीर्षक से ही छपा था। यह संयोग ही था कि उनका देहावसान भी भारत वेस्टनडीज के मैच में सचिन के असमय आउट हो जाने के बाद हृदय गति रुकने से हुआ था। अपने अंतिम दिनों में वे हिन्द स्वराज को लेकर देश भर में कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बना रहे थे, क्योंकि गांधी जी की चर्चित पुस्तक 'हिन्द स्वराज' के प्रकाशन का वह शताब्दी वर्ष था। कुछेक कार्यक्रमों में प्रभाष जोशी ने हिंद स्वराज पर व्याख्यान भी दिए थे। आज प्रभाष जोशी की दशवी पुण्यतिथि है। इस अवसर पर अमित धर्मसिंह ने अपना शोध प्रभाष जोशी को श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित किया है।