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परंपरागत त्योहार लोहड़ी पौष माह की अंतिम रात को एवम मकर संक्राति की सुबह तक मनाया जाता हैं यह  प्रति वर्ष मनाया जाता हैं, इस साल  में यह त्यौहार 13 जनवरी को मानाया जायेगा.
January 13, 2020 • TRUE स्टोरी टीम

लोहड़ी पर विशेष

           AHMAD HUSAIN
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लोहड़ी का त्योहार हर साल  भारत में 13 जनवरी को मनाया जाता है। पंजाब, हरियाणा और हिमाचल में मकर संक्रांति से पहले की शाम को लोहड़ी का त्योहार नई फसल के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। पंजाब में नववधू और बच्चे की पहली लोहड़ी बहुत खास मानी जाती है। लोहड़ी की रात खुली जगह पर लड़कियों में पवित्र अग्नि लगाते हैं और परिवार व आस-पड़ोस के लोग लोकगीत गाते हुए नए धान के लावे के साथ खील, मक्का, गुड़, रेवड़ी, मूंगफली आदि उस पवित्र अग्नि को अर्पित कर परिक्रमा करते हैं। 
लोहड़ी और मकर संक्रांति एक-दूसरे से जुड़े रहने के कारण सांस्कृतिक उत्सव और धार्मिक पर्व का एक अद्भुत त्योहार है। लोहड़ी के दिन जहां शाम के वक्त लकड़ियों की ढेरी पर विशेष पूजा के साथ लोहड़ी जलाई जाएगी, वहीं अगले दिन प्रात: मकर संक्रांति का स्नान करने के बाद उस आग से हाथ सेंकते हुए लोग अपने घरों को आएंगे। इस प्रकार लोहड़ी पर जलाई जाने वाली आग सूर्य के उत्तरायन होने के दिन का पहला विराट एवं सार्वजनिक यज्ञ कहलाता है।
लोहड़ी पौष माह की अंतिम रात को एवम मकर संक्राति की सुबह तक मनाया जाता हैं यह  ,,,,. 

 दुल्ला भट्टी का नाम लिए बगैर अधूरा है यह त्यौहार
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लोहड़ी को दुल्ला भट्टी की एक कहानी से भी जोड़ा जाता है। लोहड़ी के सभी गाने दुल्ला भट्टी से ही जुड़े हैं तथा यह भी कह सकते हैं कि लोहड़ी के गानों का केंद्र बिंदु दुल्ला भट्टी को ही बनाया जाता है। 
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 कौन थे दुल्ला भट्टी
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दुल्ला भट्टी भारत के मध्यकाल का एक वीर था, जो मुगल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उसे 'पंजाब के नायक' की उपाधि से सम्मानित किया गया था। 
उस समय संदल बार की जगह पर लड़कियों को गुलामी के लिए बलपूर्वक अमीर लोगों को बेचा जाता था। लेकिन दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को न ही मुक्त करवाया बल्कि उनकी शादी हिन्दू लड़कों से करवाई और उनकी शादी की सभी व्यवस्थाएं भी करवाईं।
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 दुल्ला भट्टी  राजपूत  थे  भारत के मध्यकाल का एक वीर था जिसने अकबर के शासन काल में मुगलों के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया। उसे पंजाब पुत्र' भी कहा जाता है। दुल्ला भट्टी की कथाएँ लोकगाथाओं में भरी पड़ी हैं। उसे 'उपकारी डाकू' की तरह याद किया जाता है। लोहड़ी का त्यौहार उसकी स्मृति में मनाया जाता है।
इस वीर की मृत्यु 1599 हुई थी।

अहमद हुसैन
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